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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Sun, 02 May 2021 10:50 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ने भाजपा को हर मुद्दे पर करारा जवाब दिया। जयश्री राम के नारे से उन्हें घेर रही भाजपा को उन्होंने मंच से ही चंडीपाठ करते हुए समूचे देश व खासकर बंगाल को बता दिया कि वह आसानी से हथियार डालने वाली नहीं हैं। वह कद्दावर नेता के रूप में उभरीं और भाजपा के तमाम क्षत्रपों की पूरी ताकत को उन्होंने न केवल झेला बल्कि उसका माकूल जवाब भी दिया।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
– फोटो : पीटीआई
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विस्तार
मौजूदा सियासी माहौल में ममता बनर्जी केंद्र सरकार व भाजपा के खिलाफ विपक्ष का सबसे ताकतवर चेहरा बनकर उभरी हैं। बंगाल चुनाव में उन्होंने साबित कर दिया कि तरकश में तीर ही काफी नहीं होते उन्हें चलाना व प्रतिद्वंद्वी के दांव को उलट देना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
कट्टर हिंदुत्व का जवाब ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ से दिया
ममता बनर्जी ने भाजपा के उग्र हिंदुत्व का जवाब ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ से दिया। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान एक भी बार ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे वह मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप अपने पर लगने दें। अंदरखाने की रणनीति कारगर रही और अपने मुस्लिम वोट बैंक को कायम रखते हुए वह हिंदुओं को नाराज नहीं करने में भी कामयाब रही। जब उन्होंने मंच से चंडीपाठ शुरू किया तो परंपरागत व देवी भक्त बंगाली समुदाय को खुश कर दिया।
मुस्लिम को असुरक्षा का भय दिखाया
प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं ने बार-बार बंगाल की सत्ता में आने पर सीएए लागू करने की घोषणाएं की, इसका उल्टा असर मुस्लिम वोटरों में हुआ और उन्होंने असुरक्षा की भावना दूर करने के लिए तृणमूल कांग्रेस में भरोसा कायम रखा। बदले में तृणमूल ने भी उन्हें भरपूर आश्वासन देकर राज्य में सीएए लागू नहीं करने का वादा किया। बंगाल में ममता की जीत की एक और बड़ी वजह महिलाओं की उनके प्रति सहानुभूति है। महिला होने के नाते उनकी इस वर्ग में स्वाभाविक स्वीकारोक्ति है। इसलिए मुस्लिम वर्ग के बाद उन्हें राज्य की महिलाओं ने भी जमकर समर्थन दिया।
‘अकेली योध्दा’ साबित कर सहानुभूति बटोरी
ममता बनर्जी ने भाजपा के तमाम नेताओं के सामने अकेले किला लड़ाया। यह भी उनकी रणनीति थी, जो कामयाब रही। अग्रिम मोर्चे पर उन्होंने अपनी पार्टी के किसी नेता को आगे नहीं आने दिया और जनता की सहानुभूति बटोरी। जबकि तृणमूल के दिग्गज नेताओं ने पार्टी से नाता तोड़ना व उनकी खुलेआम आलोचना करना जारी रखा। दिनेश त्रिवेदी जैसे अनुभवी नेता भी जब भाजपा में चले गए तो भी ममता का हौसला नहीं टूटा।
नंदीग्राम के गढ़ में घुसकर सुवेंदु को दी चुनौती
ममता बनर्जी ने अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए एक और दांव खेला। उन्होंने भवानीपुर सीट छोड़कर नंदीग्राम सीट चुनी, ताकि सुवेंदु अधिकारी को घेरा जा सके और वह दूसरी जगह भाजपा के पक्ष में ताकत न लगा सकें। इसका असर यह हुआ कि तृणमूल कार्यकर्ताओं में भाजपा को हराने का भाव और चौगुना हो गया।
मिथुन दा भी नहीं कर सके जादू
अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती ने भी भाजपा का दामन थामा तो लगने लगा था कि अब बंगाल दीदी के हाथ से निकल जाएगा, लेकिन बंगाल के दिग्गज अभिनेता व तमाम भाजपा के क्षत्रप भी कोई जादू नहीं कर सके।
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